अधिकांश बुद्धिजीवी अध्यात्म में गोता क्यों लगाते हैं ?


बुद्धिजीवी जो होशियार हैं तभी तो कारोबार में सफल हैं – समय आने पर अक्सर अध्यात्म की ओर झुक जाते हैं | झुक तो जाते हैं पर सफल एक भी नहीं होता | क्यों ?

 

लगभग हर successful बुद्धिजीवी 65 ~ 70 वर्ष की आयु में अध्यात्म की ओर मुड़ना चाहता है | जीवन में जो करना चाहते थे हासिल कर लिया, पसंद की बीबी, हंसता खेलता घर परिवार | संतों की संगत के बीच अचानक अहसास होता है कई पीढ़ियों के लिए तो कमा लिया लेकिन साथ में क्या लेकर जायेंगे | पुण्यकर्मों में उलझने का वक़्त ही नहीं मिला |

 

बुद्धिजीवी हैं, अच्छी तरह समझ रहे हैं, मृत्यु के बाद सिर्फ और सिर्फ पुण्य कर्मफल ही जाएगा | तो क्या करें – और शुरू हो जाता है धार्मिक स्थलों पर जाने का उपक्रम | कितने ही धार्मिक गुरुओं से मिलते हैं लेकिन कसक रह जाती है | सब समझ में आ रहा है लेकिन मजबूर हैं – ध्यान करना नहीं आता न क्षमता है |

 

बस यही है बुद्धिजीवियों की सफलता की कहानी – भौतिक जीवन में अपार संपदा लेकिन अगले जन्म में ले जाने को कुछ भी नहीं | बुद्धिजीवी यह भूल जाते हैं कि वे थे तो अर्जुन लेकिन सही वक़्त पर कुछ किया नहीं और पूरी जिंदगी यूं ही व्यर्थ हो गई |

 

What was the role of Arjuna in Mahabharata? आज का अर्जुन कौन आध्यात्मिक परिवेश में | Vijay Kumar

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.