आध्यात्मिक यात्रा में चिंतन का कोई अंत है या नहीं या समर्पण ही हर यात्रा का अंत है ? 4


आध्यात्मिक सफर में चिंतन क्यों किया जाता है ? ध्यान में चिंतन के माध्यम से हम self enquiry भी करते है (जैसे महर्षि रमण कहते हैं) और अपने अंदर आते हजारों प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ते हैं जिससे वे प्रश्न जड़ से समूल नष्ट हो जाएं | शनै शनै जब कर्मों की निर्जरा होने लगती है और प्रश्न कम होने शुरू हो जाते हैं तो उतने गहन चिंतन की आवश्यकता नहीं रह जाती जितनी शुरू में थी |

 

मान लें 100 kg सोने के अयस्क में एक किलो शुद्ध सोना है | यानी 1 kg खरा सोना और 99% अशुद्धियां | आपने पहले उसे कूटा, चूरा किया और फिर पानी से निकाला | अब 87 kg में I kg खरा सोना | धीरे धीरे वह अयस्क 3 kg रह गया यानी 2 kg अशुद्धि और 1 kg खरा सोना | जब 3 kg अयस्क में 1 kg शुद्ध सोना बचेगा तो पहले के मुकाबले मेहनत ज्यादा लगेगी या कम ?

 

यदि कम, तो इसका मतलब हुआ जब हम प्रभु के बहुत नजदीक होंगे तो चिंतन कुछ ही समय और करना होगा | निर्विकल्प समाधि की अवस्था में आते ही विचारों का आवागमन बंद, और शून्य की अवस्था आ जाएगी | इसके पश्चात चिंतन की आवश्यकता क्यों पड़ेगी ? जब आत्मा शुद्ध हो गई, खेल खत्म | यही अवस्था है जिसे मोक्ष कहते हैं |

 

समर्पण जो भक्तियोग में चाहिए वह आज के कलियुग संभव नहीं | इसीलिए रामकृष्ण परमहंस ने भक्ति का मार्ग छोड़ ज्ञानयोग का मार्ग लिया, ज्ञानयोग यानि ध्यान में चिंतन के रास्ते से उतरना | आज के समय ब्रह्म तक पहुंचने का चिंतन ही एकमात्र रास्ता है | आम साधक चिंतन करना ही नहीं चाहता, इसलिए धार्मिक अनुष्ठानों में फंसा रहता है |

 

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4 thoughts on “आध्यात्मिक यात्रा में चिंतन का कोई अंत है या नहीं या समर्पण ही हर यात्रा का अंत है ?

  • Jay patel

    चिंतन के द्वारा सही में कर्मो की निर्जरा होती है, कर्मो की निर्जरा कैसे होती है?

    • Vijay Kumar Post author

      जब हम चिंतन में उतरते हैं तो हमें अपने अंदर उमड़ते प्रश्नों को जड़ से खत्म करना होता है – तभी हम अपनी पांचों इन्द्रियों पर पूर्ण कंट्रोल स्थापित कर सकते हैं | अपने अंदर उमड़ते प्रश्नों का जड़ से निवारण तभी सम्भव है जब हम सत्य मार्ग पर चलते हुए हर प्रश्न के तत्व तक पहुंचें | सत्य हमें सच और झूठ में फ़र्क करने की क्षमता प्रदान करता है और हम धीरे धीरे प्रश्नों को काटते हुए सत्य की ओर अग्रसर होते जाते हैं |

      उदहारण के लिए – हमने बचपन में सुना और पढ़ा भी कि जब अभिमन्यु मां के गर्भ में थे तो अर्जुन माता सुभद्रा को चक्रव्यूह में घुसने की विधि बता रहे थे | जब तक वह माता को चक्रव्यूह से बाहर निकालने की विधि बताते, माता सुभद्रा को नींद आ गई और अंततः अभिमन्यु यह जान न सके कि युद्ध क्षेत्र में चक्रव्यूह को तोड़ बाहर कैसे निकलते हैं | अंततः अभिमन्यु युद्ध क्षेत्र में चक्रव्यूह में फंस मारे गए |

      कहानी का शाब्दिक अर्थ तो सब समझ लेते है लेकिन जब हम आध्यात्मिक चिंतन में उतरते हैं तो अहसास होता है – कोई गर्भ में कैसे कुछ समझ सकता है ? अधिक विचार करने पर काफी समय बाद यह समझ आने लगता है कि महर्षि वेदव्यास आखिर समझाना/ कहना क्या चाहते हैं | महर्षि की माने तो – समस्त संसार/ पूरी दुनिया मायावी है, तभी इसे मायानगरी कहा गया है |

      इस मायानगरी में आने का (चक्रव्यूह में घुसने का) रास्ता सबको मालूम है – यानि इस धरती मां पर हम पैदा तो हो जाते हैं लेकिन इस जन्म मरण के चक्रव्यूह से छुटकारा कब मिलेगा – किसी को नहीं मालूम | ८४ लाख योनियों के भव/ फेर में बस घूमते रह जाते है और आखिरी छोर नहीं मिलता | मुझे ३२ वर्ष पूर्व ब्रह्म का २ १/२ घंटे का साक्षात्कार हुआ था लेकिन कोई पहल तो करे !

      जिस दिन हमारे अंदर एक भी प्रश्न बाकी नहीं रहेगा – न कोई विचार अंदर आएगा न बाहर जाएगा तो निर्विकल्प समाधि की स्थिति आ जाएगी और हमारा अध्यात्मिक सफर पूरा हो जाएगा – और अंततः हमारा सहस्त्रार हमेशा के लिए एक्टिव हो जाएगा – यानी आत्मज्ञानी, तत्वज्ञानी बनने की स्थिति |

      • Jay patel

        धन्यवाद, गुरुजी। मैं आशा करता हु की मैं चिंतन करना सीख जाऊंगा धीरे धीरे।

        • Vijay Kumar Post author

          समय कितना भी लगे (यानि फल की चिंता कभी नहीं करनी) – अपने जीवन के लक्ष्य की ओर दृढ़ रहो – कामयाबी मिल कर रहेगी | क्यों – ब्रह्म भी इंतजार में रहते हैं 800 करोड़ में कोई तो आगे बढ़े | ब्रह्म खुद तो बार बार आते नहीं – यह जिम्मेदारी उन्हीं के सिर रहती है जिन्हे ब्रह्म का साक्षात्कार हो चुका है |

          तुम्हारी अध्यात्म की पकड़ अच्छी है – धीरे धीरे स्वतः सब कुछ प्राप्त करते जाओगे |