भगवान को प्राप्त करने के इच्छुक साधक – जो मंदिर जाते हैं – हवन, यज्ञ आदि भी करवाते है, गुरु का सानिध्य भी करते हैं और तीर्थ स्थलों पर जाने में कमी नहीं रखते – क्या वह सभी इस बात का चिंतन करते हैं कि भगवान, ब्रह्म में पूर्ण श्रद्धा के बिना आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं | पूरी दुनिया में कितने लोग होंगे जिनकी ब्रह्म में पूर्ण आस्था है ? मेरा मानना है – मुश्किल से दो या तीन | जिस साधक की भगवान में पूर्ण आस्था हो, उसे स्वामी विवेकानंद के लेवल तक पहुंचने में मात्र 12 वर्ष का समय चाहिए | मेरी धारणा का मुख्य कारण – ब्रह्म से साक्षात्कार |
धार्मिक परिवेश में हनुमानजी की मान्यता चरम पर है – क्यों ? क्योंकि वे भगवान राम के अनन्य, अप्रतिम भक्त थे | भक्ति की महत्ता हनुमानजी के राम के प्रति अटूट विश्वास, १००% श्रृद्धा में साफ नजर आती है | जिस प्रकार कैकई के एक बार कहने पर राम १४ साल के वनवास पर चले गए, वहीं श्रृद्धा हनुमानजी की राम के प्रति दिखती है | सच्चे भक्त को सब कुछ कहना नहीं पड़ता – वह तो आराध्य की भावभंगिमा समझ कार्य को समय से उचित अंजाम दे देता है | कह कर काम तो उन से कराया जाता है जो आप पर आश्रित हैं | रामकृष्ण परमहंस के कहने से पहले ही स्वामी विवेकानंद उनकी बातों का मर्म समझ जाते थे |
ब्रह्म में पूर्ण आस्था यूं ही नहीं जागती | जब साधक यह निर्णय ले ले कि इसी जन्म में ब्रह्म तक पहुंचना है, उसे पाना है तो किसी शक की गुंजाइश ही नहीं रहती | फिर साधक यही सोचता है – मैं अपने अंदर राम जैसा, हनुमानजी वाला पूर्ण समर्पण भाव कैसे पैदा करूं की ब्रह्म के इसी जीवन में दर्शन हो जाएं, साक्षात्कार हो जाए | कैकयी ने चाहा नहीं और राम 14 वर्ष के वनवास के लिए तैयार हो गए | हां या न की कोई गुंजाइश नहीं | पूर्ण समर्पण भाव अंध भक्ति नहीं है – वह तो उन मूल्यों के प्रति समर्पण है जिन्हें हम हमेशा से हृदय से मानते आए है |
भारतीय परिवेश में आप अक्सर देखेंगे – मंदिर जाने वाला, गंगाजी में स्नान करने वाला, गुरु का सानिध्य करने वाला धर्मप्रिय व्यक्ति दूसरों को नसीहत देता हुआ मिलेगा कि भगवान में पूर्ण श्रद्धा बिना कुछ हासिल नहीं होता लेकिन खुद इसके लिए कुछ प्रयास नहीं करेगा | कब ब्रह्मचर्य आश्रम के 25 वर्ष बीत गए, अगले 25 वर्ष गृहस्थ आश्रम और फिर 25 साल का वानप्रस्थ आश्रम – मालूम ही नहीं चला और जीवन की संध्या आ गई | ऐसे धार्मिक लोग सिर्फ नाम के धार्मिक है – कृत्य से नहीं | सच्च आध्यात्मिक साधक खुद में डूबा रहता है – शनै शनै कर्मों की निर्जरा करता हुआ |
अगर आप सच में ब्रह्म को पाना चाहते हैं तो श्रृद्धा, पूर्ण समर्पण जैसे शब्दों का तार्किक मतलब समझने की कोशिश करें – शाब्दिक अर्थ जानने से कोई लाभ नहीं | अध्यात्म, धर्म और religion – इन तीन शब्दों का तात्विक अर्थ समझने में मुझे पूरे 15 वर्ष लगे | आज के समय में ज्यादातर लोग धर्म को ही अध्यात्म, धर्म को ही religion मान बैठे हैं | सत्य को साक्षी मान हमें गहरे चिंतन में उतर – हर शब्द के सही तार्किक उत्तर तक पहुंचना ही होगा | तभी हमारी आध्यात्मिक उन्नति संभव है | उथले पानी में तैरने से कुछ नही होगा – मोती चाहिएं तो गहरे तले पर जाना ही होगा |
आध्यात्मिक क्षेत्र में हर कार्य कठिन है, बेहद कठिन लेकिन कोई चारा भी नहीं | 5 वर्ष की आयु से मेरी ब्रह्म में श्रद्धा 100% – अक्सर उनसे कहा करता – टेस्ट लेकर देख लो – तुम फेल हो जाओगे – मैं नहीं | और जब ब्रह्म अट्टहास करते तो मैं समझ जाता ब्रह्म भी मुझमें पूर्ण विश्वास रखते हैं – आखिर उनका अंश जो ठहरा | ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलते हुए अक्सर मैं ब्रह्म से कहा करता कभी मेनका बनकर इस विश्वामित्र का test तो ले लो – तुम फेल हो जाओगे मैं नहीं | ब्रह्म को कितने ही प्रलोभन दिए – लेकिन मेरी अटूट श्रृद्धा देख ब्रह्म चुप ही रहते |
अपने 65 वर्ष के आध्यात्मिक सफर में मुझे अभी तक 2~3 साधक मिले जो सच के रास्ते पर चलकर आगे बढ़े तो सही लेकिन फिर फल के चक्कर में फंसकर बीच में ही लुढ़क गए | फल कैसा और फल की चिंता क्यों | भगवद गीता में कृष्ण कर्म करने पर जोर देते हैं, फल की चिंता किए बिना | फल की चिंता वहीं करेगा जिसने अपनी मैं को फिर से महत्व देना शुरू कर दिया है | जिसकी ब्रह्म में पूर्ण श्रद्धा हो, उसे काहे का डर ? जब सभी ब्रह्म का है, आत्मा का है, हमारा कुछ भी नहीं – तो हमारे चिंता करने से क्या होगा ? अभी कुछ समय से एक साधक जुड़ा है जिसमें स्वामी विवेकानंद बनने की पूरी कब्लियत है – समय बतायेगा उसका चिंतन उसे कहां तक ले जाएगा | सभी साधकों को इस बात का ज्ञान रहे जीवन एक ही है |
पूरा भारतवर्ष ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जो वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश के बाद भी आध्यात्मिक सफर शुरू ही नहीं करते | पूछो तो कहेंगे – इस जन्म में पोते पोतियों, नाती नातिनो की देखभाल से फुर्सत नहीं मिलती, आध्यात्मिक सफर अगले जन्म के लिए छोड़ दिया | इस जन्म में करने की चाह नहीं, अगले जन्म की गारंटी ? ऐसी भुलभुलैया में रहने वाले साधकों को कुछ भी आध्यात्मिक, न इस जन्म में, न अगले जन्म में नसीब होगा | भौतिक जीवन के खूंटे से बंधे आध्यात्मिक उन्नति करें तो कैसे ? यहां हमारी willpower आत्मशक्ति काम आती है | बाहर से आकर कोई हमारी जिंदगी का उद्देश्य तय नहीं करेगा – हमें ही निर्णय लेना होगा कि आध्यात्मिक क्षेत्र में उतरना है या नहीं और कब ?
मेरा आध्यात्मिक सफर तो 5 वर्ष की आयु में ही शुरू हो गया था | भगवान, परमेश्वर, ब्रह्म को जानने की तीव्र इच्छा थी | ब्रह्म से प्रार्थना करता रहता – प्रभु दर्शन दो | स्कूल तो जाता लेकिन ब्रह्म के खयालों में डूबा रहता | कब कहां कैसे शुरू करना है – कुछ ज्ञात नहीं था | जब 8 1/4 वर्ष का था तो ब्रह्म ने पूछा – मुझे पाना चाहता है – इस जन्म में अध्यात्म में उतर मुझे प्राप्त करना चाहता है – मुंह से निकला हां | बात आई गई हो गई – स्कूल के कामों में व्यस्त | लगभग 8 3/4 आयु के लगभग ब्रह्म ने सुबह ही पकड़ लिया – मेरे पीछे आना चाहता था, क्या हुआ ? मैं कुछ कहता उससे पहले ब्रह्म बोले – 24 घंटे की मोहलत देता हूं, तय कर और बता |
अगले दिन इससे पहले ब्रह्म कुछ कहते, मेरे मुंह से निकला – हां, हां और हां | अब चाहे कुछ भी हो जाए, में इसी जन्म में तुझे प्राप्त कर के रहूंगा | ब्रह्म बोले – मुझे प्राप्त करने का मतलब समझता है – जन्म मरण के चक्रव्यूह से हमेशा के लिए छुट्टी | चलेगा, फाइनल – मुंह से फिर निकला हां और मेरा आध्यात्मिक सफर आधिकारिक तौर पर शुरू हो गया – ब्रह्म ने खुद इजाजत जो दे दी थी | और 37 वर्ष की आयु में finally ब्रह्म से 2 1/2 घंटे का साक्षात्कार हो ही गया – जब ब्रह्म (पूरे ब्रह्मांड के रचियता) २ १/२ घंटा मेरे पास बैठे रहे और समस्त ८४ लाख योनियों का सफर कराया और पूरे ब्रह्मांड को विस्तार से दिखाया |
12 years Tapasya | 12 साल की घोर तपस्या का सच | Vijay Kumar Atma Jnani
