स्वतंत्र भारत का आम नागरिक – ब्रह्म की खोज में क्यों धर्म धर्म चिल्लाता गर्त में खो जाता है ?


70 ~ 80 वर्ष के जीवन में हम भगवत प्राप्ति की ओर क्यों नहीं बढ़ पाते ? मंदिर जाने, हरिद्वार या किसी भी धार्मिक स्थल में जाकर गंगा नदी में डुबकी लगाने से क्या ब्रह्म से मुलाकात हो जाएगी ? क्या गुरुओं का सत्संग कर ब्रह्म मिल सकते हैं ? घर में यज्ञ, हवन इत्यादि करने से क्या हम ब्रह्म की ओर बढ़ते हैं ? उपरोक्त बाते खुद को भ्रमित रखने के लिए ठीक हैं लेकिन ब्रह्म को पाने के प्रयास में इन सबकी सार्थकता 0% है ! जानिए क्यों ?

 

आप मंदिर में रोजाना 2 घंटे व्यतीत करें या ज्यादा, धार्मिक क्रिया कलापों से कुछ भी प्राप्त नहीं होता | भगवद प्राप्ति के लिए अपनी मैं को हमें समय के साथ जड़ से खत्म करना ही होगा | बिना पूर्ण समर्पण भाव के अध्यात्म की दुनिया में कुछ भी प्राप्त नहीं होता | अध्यात्म – यह किस चिड़िया का नाम है ? लोग मंदिर जाते हैं और सोचते हैं आध्यात्मिक हो गए | अध्यात्म शब्द का मतलब, मर्म, तत्व समझने में 10 वर्ष भी लग जाएं तो कम है |

 

यह सिर्फ अध्यात्म ही है जो हमें ब्रह्म की ओर प्रेरित करता है | धार्मिक क्रियाकलापों, कर्मकांडो में उलझे रहने से कभी कुछ प्राप्त नहीं होता | ब्रह्म मंदिर में स्थापित मूर्तियों में नहीं रहते | ब्रह्म को जानने के लिए – खुद की मैं को कंट्रोल कर – अपने भीतर हृदय में स्थित ब्रह्म तक पहुंचना होता है | ब्रह्म हृदय में स्थित तो नहीं, लेकिन हृदयस्थल ही वह जगह है जिसके द्वारा ब्रह्म तक पहुंचा जा सकता है | हृदय ही क्यों ? कभी सोचा है जन्म से मृत्यु तक अनवरत हृदय धड़कता कैसे रहता है ?

 

मंदिर जाने की बजाय हमें घर में रह कर ही चिंतन करना चाहिए – जब भी संभव हो सके | मैं 5 वर्ष की आयु से 24 घंटे चिंतन कर सकता था – एक सेकंड रुके बिना | Morning walk, स्नान, नाश्ता करते समय अंदर ही अंदर चिंतन चलता रहता था | आखिरकार हमें अपने अंदर निहित गूढ़ प्रश्नों के उत्तर जो चाहिए थे | प्रश्न जैसे – में कौन हूं, मेरा वनस्पतियों, पशुओं से नाता क्या है – मुझे किसने बनाया, मेरे जीने का वास्तविक कारण क्या है, भगवान कौन होते हैं, हम उनकी पूजा क्यों करते हैं इत्यादि |

 

समय के साथ मैंने जाना – ध्यान में चिंतन द्वारा उतारा जा सकता है | अगर ध्यान की सही प्रक्रिया समझ आ गई तो स्वामी विवेकानंद के लेवल तक पहुंचने में मात्र १२ वर्ष का समय चाहिए | साथ ही साथ ब्रह्मचर्य की प्रक्रिया को समझना होगा | पूरे १२ वर्ष की ब्रह्मचर्य की तपस्या ! अगर १२ वर्ष में ब्रह्मचर्य और योग साधना पूर्ण कर ली तो २ वर्ष और रामकृष्ण परमहंस के लेवल तक पहुंचने के लिए | रामकृष्ण परमहंस यानि एक तत्वज्ञानी, आत्मज्ञानी – जिसने ८४ लाख योनियां पार कर ली और जीवन के अंतिम चरण में मोक्ष प्राप्त हो जाएगा |

 

रामकृष्ण परमहंस या महर्षि रमण – दोनों अपने जीवन में क्लेशों के बंध को हमेशा के लिए काट आत्मज्ञानी, तत्वज्ञानी हो हमेशा के लिए जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गए |

 

अब हम लौट कर आते हैं गंगा स्नान पर – मन में कुपित विचारों का अंबार लिए हम पवित्र गंगाजी में कितनी भी डुबकियां लगा लें, क्या कभी आध्यात्मिक उद्धार होगा ? मैं ५ वर्ष की आयु से एक बार भी गंगाजी में डुबकी लगाने नहीं गया – जबकि गंगा नदी घर से मात्र २८ km दूर बहती है | घर में रहकर ही हर समय सकारात्मक सोच में डूबा रहता | गलती चाहे दूसरे की हो, मन में कभी  नकारात्मक विचार घुसने ही नहीं दिए | मन स्वच्छ रहता तो ब्रह्म से बात करने का मौका मिलता रहता | मेरी ब्रह्म से लगभग रोज ही बात होती |

 

अब आते हैं गुरुओं के सत्संग पर | ५ वर्ष की आयु से अध्यात्म की राह पर चलते – हजारों प्रश्न मन में आए जिनका मुझे उत्तर चाहिए था | सोचा तो जाना – पहली गुरु मां होती है | मां से प्रश्न किए पर सही उत्तर नहीं मिला | फिर पिताजी से पूछा – तो बोले स्कूल की पुस्तकों पर ज्यादा ध्यान दिया करो | बुआ से कुछ प्रश्नों के उत्तर मिले – क्योंकि वह दिल्ली के एक स्कूल की principal थीं | आखिर में दादाजी – उनसे उत्तर मिलने की बेहद उम्मीद थी | क्यों ?

 

दादाजी ने कम उम्र में ही सन्यास ले लिया था | 38 की उम्र से घर में पूर्ण सन्यासी की तरह रहते थे | घर में सब उनसे बात करने में डरते थे – मेरे अलावा | मैंने मौका देख एक दिन बाबाजी से कहा – आपसे कुछ प्रश्न पूछने हैं | बाबाजी को मेरी 5 वर्ष की आयु से भगवान के प्रति जिज्ञासा ज्ञात थी | वह टालते रहे | लगभग ६ महीने पश्चात उन्होंने मुझे कहलवाया – पप्पू से कहना इतवार को सुबह ७ बजे उनके कमरे में आए | मैं हाजिर हो गया |

 

कमरे में मूढ़ा पड़ा था, पूछ कर बैठ गया | दादाजी से कहा प्रश्न पूछूं | उन्होंने कहा हां | पहला प्रश्न, दादाजी चुप, बोले दूसरा पूछो – दूसरा प्रश्न और दादाजी फिर चुप | इससे पहले मैं तीसरा प्रश्न पूछता – बाबाजी बोले – पप्पू, तेरे किसी भी प्रश्न का मेरे पास उत्तर नहीं और न कभी होगा | मैंने कुछ देर उनकी ओर देखा और मुंह से अनायास निकला – बाबाजी ढोंग करना बंद करो – यह जो पोथियां, शास्त्र आपके सामने रखे हैं इन्हें उठाकर बाहर फेंक दो | जब भगवान को जानते नहीं तो इन्हें पढ़ने का क्या लाभ | बाबाजी ने न बुरा माना न डांटा और मैं बाहर आ गया |

 

7 वर्ष की आयु से गुरु ढूंढने शुरु किए जो मेरी शंकाएं दूर कर सकें पर मिला कोई नहीं | पूरा गांव, शहर छान मारा पर मिला कोई नहीं | पिताजी central government job में थे | जब भी स्कूल की छुट्टी होती और उनका सरकारी दौरा होता – मैं साथ हो लेता | शायद कोई मिल जाए जो शंकाएं दूर कर सके | समय गुजरता गया | IIT से engineering कर घर के business में पैर रखा | Company का headquarter Delhi, Zonal office Cochin और regional office Madras.

 

Office के कार्यों से पूरे भारत में घूमना पड़ता | जहां भी लगता प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं – पूछ बैठता | पूरे भारतवर्ष में एक भी इंसान नहीं मिला जो मेरे प्रश्नों के उत्तर दे सके | 1987 में 40 दिन के अंतरराष्ट्रीय भ्रमण का मौका मिला – US, Canada और Europe की 7 countries. हर संभव प्रयास किया लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान किसी को भी नहीं | अंतरराष्ट्रीय trip से पूर्णतया खाली हाथ लौटा |

 

फिर एक दिन अचानक ब्रह्म से पूछा – प्रभु अब तो बहुत कोशिश कर ली, पर शंका दूर करने वाला कोई गुरू मिलता ही नहीं | अनायास मुंह से निकला – क्या आप मेरे गुरू बनोगे ? आवाज़ आई हां ! मेरे मुंह से फिर अचांचक निकला – पहले नहीं कह सकते थे, कितने समय से भटक रहा हूं | ब्रह्म बोले – तुमने पहले पूछा ही नहीं और हंस कर अंतर्धान हो गए | उस दिन से मैंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा | मुझे यह समझ आ चुका था – रामकृष्ण परमहंस या महर्षि रमण जैसे तत्वज्ञानी तो आजकल मिलेंगे नहीं – तो गुरू कौन ?

 

गुरु न मिलने के पीछे की कहानी भी पूरी तरह समझ आ गई | अध्यात्म एक अंदरूनी सफर है | हमें हृदय में स्थित ब्रह्म तक पहुंचना है | इसके कोई ब्राह्म गुरु कर भी क्या सकता है | चिंतन स्वाध्याय की एक प्रक्रिया है – इसमें बाहरी हस्तक्षेप कैसे काम करेगा ? चिंतन स्वयं करना होगा – इसमें गुरु क्या करेगा | रामकृष्ण परमहंस या महर्षि रमण जैसा तत्वज्ञानी मिल भी जाए तो कितने समय का सानिध्य मिलेगा ? महर्षि रमण से जो भी मिलने जाता था – मीलों लंबी queue में खड़े होना पड़ता था | राजा हो या रंक – किसी को प्राथमिकता नहीं |

 

जब स्वाध्याय, ध्यान, चिंतन की प्रक्रिया स्वयं करनी है तो गुरु की आवश्यकता नहीं ? भारतीय दर्शन शास्त्र – भगवद गीता और उपनिषद गुरु की आवश्यकता पर बिल्कुल भी जोर नहीं देते | बात साफ है – जिसने गुरु बनाया – उसका आध्यात्मिक सफर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया | बहुत सोच समझ कर मैंने पूरे जीवन महर्षि रमण का self enquiry, नेति नेति का रास्ता अपनाया | चिंतन द्वारा, अपने अंदर उमड़ते हजारों प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए नेति नेति  से बेहतर कोई रास्ता नहीं |

 

अब हम आते हैं यज्ञ और हवन करने की महिमा पर | अगर घर की शुद्धि करनी हो तो किसी पंडित को बुलाकर घर में हवन किया जा सकता है लेकिन स्वयं की शुद्धि, कर्मो की निर्जरा हवन के माध्यम से हो ही नहीं सकती | कर्मो की निर्जरा सिर्फ शुद्ध चिंतन से संभव है | पहले समय में जब मानवता को भगवान के स्वरूप के बारे में भी ज्यादा मालूम नहीं था, तो विभिन्न देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ किए जाते थे | अगर राज्य का विस्तार करना हो तो अश्वमेघ यज्ञ | आज अगर भारत को POK वापस लेना हो तो क्या सरकार को अश्वमेघ यज्ञ करवाना चाहिए | क्या ऐसा करने से अपेक्षित फल मिलेगा ?

 

वह समय गुजर गया जब यज्ञों की जरूरत हुआ करती थी | आज के समय में संपूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान गीताप्रेस द्वारा संपादित भगवद गीता एवम् विभिन्न उपनिषदों में निहित है | कहीं जाने की जरूरत नहीं, न ही यज्ञ करने की | कोई भी सच्चा साधक, ब्रह्मचारी या विवाहित, घर में रहते हुए भी, ब्रह्मज्ञान का अधिकारी बन सकता है | रामकृष्ण परमहंस और महर्षि रमण ने हिमालय में जाकर तपस्या नहीं की | सब कुछ घर या कुटिया में रहकर कर लिया और अपने जीवन काल में आत्मज्ञानी, तत्वज्ञानी बन मोक्ष के अधिकारी बन गए |

 

मैं कभी रामकृष्ण परमहंस या महर्षि रमण से मिला नहीं, लेकिन पूरे आध्यात्मिक सफर में मुझे उनकी कमी कभी भी महसूस नहीं हुई | महर्षि रमण या रामकृष्ण परमहंस पर लिखी किताबों में मुझे वह मर्म मिल जाता जिसकी मुझे तलाश थी | सत्य की राह पर चलने के कारण, मैं हंस की भांति ज्ञान के मोती चुग लेता था | 200 पन्नों की किताब में मुझे अगर 2 प्रश्नों के उत्तर भी मिल गए तो काफी था | मैं रोजाना 400 से 800 पन्नों की 2~3 किताबें पढ़, मर्म समझ लेता था | सत्यपथ की महिमा अपरंपार है | सत्य की राह पर चलकर हम मोटी मोटी पुस्तकों में छिपे मर्म को आसानी से समझ सकते हैं – हंस की तरह |

 

हर सच्चे साधक से मेरा विनम्र निवेदन है – किसी की भी न सुने, सुने भी तो करें अपनी | ब्रह्म नियमानुसार पूरे विश्व में 100 ~ 150 वर्षों में सिर्फ एक या दो मनुष्यों को ब्रह्म को प्राप्त होने का मौका मिलता है | 11 लाख मनुष्य योनियां और पूरे 1 करोड़ वर्ष की अवधि – समय की कमी नहीं ब्रह्म तक पहुंचने की | अगर हम इसी जन्म में ब्रह्म प्राप्ति के इच्छुक हैं तो शास्वत सच को समझना ही होगा – धार्मिक कर्मकांडो से कुछ भी हासिल नहीं होगा | हमें अध्यात्म में ध्यान और ब्रह्मचर्य के रास्ते से उतरना होगा | नीचे दिए videos में मर्म को समझें |

 

Dhyan kaise karein | ध्यान करने की सही विधि | Vijay Kumar Atma Jnani

 

12 years Brahmacharya benefits | 12 साल का अखंड ब्रह्मचर्य का जादू | ब्रह्मचर्य मंत्र | Vijay Kumar

 

What is the real meaning of spirituality? अध्यात्म का वास्तविक अर्थ क्या है ? Vijay Kumar Atma Jnani

 

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